वृक्षों में भी पीपल या अश्वत्थ का विशेष महत्त्व है। यह हिमालय की ऊँचाइयों को छोड़कर सर्वत्र पाया जाता है। यह बरगद का भाई है, कभी-कभी बरगद-पीपल दोनों के लिए अश्वत्थ शब्द का प्रयोग हुआ है। पर बरगद से पीपल इसलिए विशिष्ट है कि यह सर्वांग मनोहर है, विशेषकर इसमें जब नए किसलय निकलते हैं और बिना किसी हवा के स्पर्श के हिलते दीखते हैं, तो ऐसा लगता है कि हज़ार-हज़ार छोटी-छोटी झाड़ियां किसी विशेष आगमन की सूचना देती हैं। पलाश के फूल तो अंगारे की तरह दिखते हैं, पर पीपल के नए पल्लव ऐसे मनोहर होते हैं कि हज़ार-हज़ार पक्षी दौड़-दौड़ आते हैं। पीपल का पेड़ भारत का दुर्निवार पेड़ है, इसे कोई लगाए न लगाए, कहीं उग जाता है। पुराने मकानों की संधियों में, जहाँ चिड़िया पीपल का गोदा खाकर उसके बीज यहाँ-वहाँ डाल देती है। इसी कारण पीपल का पौधा कहीं भी उग आता है। इन पेड़ों की जड़ें बहुत लम्बी होती हैं। भारत के गावों में लोग इसे काटते हुए डरते हैं। पीपल का पेड़ बड़ा पवित्र है। पीपल के पत्तों पर लोग रामनाम लिखते हैं। पीपल की छाँव में गाँवों में पंचायत जुटती थी, ताकि लोग वहाँ झूठ न कहें। पीपल सत्य है, क्योंकि निरंतरता है। गाँवों में हमारी ओर पीपल को वासुदेव कहते हैं-वासुदेव श्रीकृष्ण ने गीता में अपने को वृक्षों में अश्वत्थ अर्थात् पीपल ही घोषित किया है।
पीपल का पेड़ ही आरंभिक भारतीय कला में अविच्छिन्न की उपस्थिति है (जब उनकी मूर्ति नहीं अंकित होती थी)। पीपल के पेड़ में मरे व्यक्ति की शांति हेतु एक मटका बाँधा जाता है जो करीबन दस दिनों के लिए होता है। इस मटके से जल की बूंद निरंतर टपकती रहती है जो जीवन चक्र को दर्शाती है। पीपल सृष्टि का अविच्छिन्र प्रवाह है। पीपल का पेड़ ढह जाए, उसका बीज वहीं और कई जगह और उग आता है। पीपल के पेड़ की जड़ों पर सिर टेके श्रीकृष्ण ने जरा सा तीर झेला और अपनी लीला समेटी।
उस स्थान पर पीपल का पेड़ बना रहा, एक साल बाढ़ में ढहा, मामूली पाँच-छह पंक्तियों का समाचार छपा, बाद में उसी स्थान पर वृंदावन से पीपल का पौधा ले जाकर भागवत भूमि यात्रा के अवसर पर स्वर्गीय अजेय ने लगाया था, वैसे पीपल के पेड़ के बहाने श्रीकृष्ण को अंजलि दी जाती रहूँ। वासुदेव से संबंध टूटने न पाए। वासुदेव से संबंध संस्कृति की संपूर्णता से संबंध है।