Comprehension Passage

निर्देश: नीचे दिए गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा गद्यांश में वर्णित तथ्यों के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए।

अनुशासन की धारा का इतना परिचय देने के बाद अब हम इस स्थिति में होते हैं कि इस वृत्त के शास्ता और केंद्रीय व्यक्तित्व महावीरप्रसाद द्विवेदी के योगदान का मूल्यांकन करें, यों अब तक भी इस क्रम में हम, भले ही अज्ञात भाव से, किसी रूप में करते यही आये हैं। स्वच्छंदतावादी धारा में केन्द्रीय चरित्र श्रीधर पाठक का था और अनुशासन की धारा में महावीरप्रसाद द्विवेदी का। इन दोनों के वैषम्य का एक एतिहासिक प्रमाण इस बात से मिलता है कि अनेक आग्रहों के बावजूद कविवर श्रीधर पाठक ने ‘सरस्वती’–संपादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को कोई रचना प्रकाशित करने के लिए नहीं भेजी। दोनों के बीच नियमित पत्र-व्यवहार चलता था, अंग्रेजी में, जिसमें से कुछ पत्र संकलित और प्रकशित हुए हैं द्विवेदी जी के पत्र पाठक जी के नाम’ से। संकलनकर्ता पद्मधर पाठक ने अपने ‘निवेदन’ में लिखा है “द्विवेदी जी के निरंतर आग्रह पर भी उन्होनें ‘सरस्वती’ के लिए कभी कुछ नहीं भेजा।” यद्यपि रोचक तथ्य यह है कि अपनी कई रचनाएँ प्रकाशित होने पर कवि ने संपादक के पास भेजी हैं, जिसका उल्लेख इस पत्र-व्यवहार में हुआ है।
अपनी पुस्तक ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में रामविलास शर्मा ने हिंदी नवजागरण के तृतीय चरण के केन्द्रीय व्यक्तित्व के रूप में आचार्य द्विवेदी के योगदान का सही मूल्यांकन किया है, पर इसके लिए उनके भाषिक अनुशासन-संबंधी कार्य का अवमूल्यन करना जरुरी नहीं था। वे अपनी भूमिका में लिखते हैं, “भाषा-परिष्कार का काम व्यापक कार्यक्रम का एक अंश मात्र है और वह उसका सबसे महत्वपूर्ण अंश नहीं है।” रामविलास शर्मा के विवेचना से ध्वनित होगा कि आचार्य द्विवेदी के कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण अंश उनके द्वारा अर्थशास्त्र-विषयक ग्रंथ ‘संपत्ति-शास्त्र’ के लेखक-रूप में महावीरप्रसाद द्विवेदी का उल्लेख इसलिए होता है कि वे ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक थे और उन्होनें स्वयं अपने से बड़े रचनाकर्मियों का वृत्त तैयार किया था, या कि वे अकेले इस पुस्तक के लेखक-रूप में पहचाने जाते यदि ‘सरस्वती’ का सम्पादन उन्होनें न किया होता? केंद्र और हाशिए का अंतर मद्धिम करने से इतिहास का परिप्रेक्ष्य दूषित होगा। यहाँ समझना होगा कि केंद्र में ‘सरस्वती’ पत्रिका अपने विविध अंगो-उपांगों सहित है, जिनमें से ‘संपत्ति-शास्त्र’ भी एक महत्वपूर्ण अंग है। पुनर्जागरण-युग की संश्लिष्ट चेतना है, जिनमें से ‘संपत्ति-शास्त्र’ भी एक महत्वपूर्ण अंग है। पुनर्जागरण-युग की संश्लिष्ट चेतना के अनुरूप जैसे भारतेंदु का व्यक्तित्व है, वैसे ही महावीरप्रसाद द्विवेदी का। वे मूलतः ‘सरस्वती’ के संपादक हैं, जो शुद्ध साहित्यिक पत्रिका नहीं है, अपने नामकरण के बावजूद। उस युग की सामान्य पत्रकारिता ही ऐसी है। भारतेंदु ‘कवि-वचन-सुधा’ जैसे नाम की पत्रिका में स्वदेशी के व्यवहार के लिए प्रतिज्ञा-पत्र प्रकाशित करते हैं, तो महावीरप्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ में ‘संपत्ति-शास्त्र’ नामक अपनी पुस्तक के अंश छापते हैं। दोनों की एक ही मूलवृत्ति है मानव-जीवन की समग्र-संश्लिष्ट प्रस्तावना करना। महावीरप्रसाद द्ववेदी का व्यक्तित्व अपने शिष्य निराला की ही तरह सामान्य स्तर पर अव्याख्येय है। जीवन के पूर्वार्द्ध का बड़ा हिस्सा वे रेल-विभाग में तार बाबू के रूप में बिताते हैं। 1903 में ‘सरस्वती’ का सम्पादकीय दायित्व स्वीकार करते हैं, अपेक्षाकृत बहुत कम मासिक वेतन पर। 1907 में ‘संपत्ति-शास्त्र’ का लेखन करते हैं, अपेक्षाकृत बहुत कम मासिक वेतन पर।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'संपत्ति-शास्त्र' का लेखन कब किया?

1
1903
2
1904
3
1905
4
1907

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