निम्नलिखित गद्यांश को पढ़े और प्रश्न का उत्तर दें:
‘चंद्रकांता’ के अभूतभूर्व स्वागत के बाद एक दशक से भी अधिक समय लगाकर देवकीनंदन खत्री ने राजकुमारी से महारानी बनी चंद्रकांता के पुत्रों की कथा के माध्यम से इसी कथा-शृंखला को ‘चंद्रकांता संतति’ (1894-1905) के चौबीस भागों में पूर्ण किया। इसके बाद इसी शृंखला को अपने ऐयार पात्र भूतनाथ को केंद्र में रखकर वे ‘भूतनाथ’ लिख रहे थे, जिसे 1913 में हुई अपनी असामयिक मृत्यु के कारण पूरा नहीं कर सके। वे इसके सिर्फ छ: भाग ही लिख सके। इक्कीस भागों में समाप्त होने वाले इस उपन्यास को उनके निधन के बाद उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने पूरा किया। इस शृंखला के बीच-बीच में उन्होंने कुछ और उपन्यास भी लिखे-‘नरेंद्र मोहनी’ (1893), ‘कुसुम कुमारी’ (1894-1898), ‘वीरेंद्र वीर अर्थात कटोरा भर खून’ (1895), और ‘काजर की कोठड़ी’ (1902) इनके अतिरिक्त वे ‘लैला-मजनू’ और ‘गुप्त गोदना’ भी लिख रहे थे, जो उनके निधन के कारण अधूरे ही रह गये। देवकी नंदन खत्री के उपन्यासों के वास्तविक महत्व और प्रकृति को समझने के लिए ‘तिलिस्म’ और ‘ऐयार’ शब्दों के अर्थ जान लेना ज़रुरी है। ये दोनों शब्द अरबी भाषा के हैं। ‘तिलिस्म’ अरबी में भी ग्रीक भाषा से आया। ग्रीक भाषा में ‘टेलेस्मा” शब्द मंत्र-तंत्र के लिए इस्तेमाल होता था। इसी से आगे चलकर अंग्रेज़ी शब्द ‘टैलिस्मन’ बना। तिलिस्म का शाब्दिक अर्थ है- अद्भुत और आश्चर्यजनक कल्पना, ‘संचित कोष की रक्षा के लिए नियत की गई भयावनी शक्ल, दवाओं तथा लग्नों के मेल से बँधा हुआ यंत्र।‘ ‘ऐयार’ के अर्थ होते हैं चालाक, वेग से चलने वाला या दूर तक दौड़ने वाला।