कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक़ है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गये हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जायेगी तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लौटना असम्भव न्नहै। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, अज वह आ गयी।
अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो संवैयों खायेंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी क्रायम अली के घर दौड़ें जा रहे हैं। उन्हें क्या ख़बर कि चौधरी आज आँखें बद्ललें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाये। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का भरा हुआ है। बारबार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और ख़ुश होकर फिर रखलेते हैं। गिनता है, एक-दो, दस-बारह! उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के महमूद पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनत पैसों में अनगिनत चीजें लायेंगे-खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या।