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परसाईं जी की रचना 'भोलाराम का जीव' एक व्यंग्य रचना है। इस रचना में लेखक ने एक मनुष्य की आत्मा के लुप्त हो जाने की घटना के माध्यम से शासकीय व्यवस्था, घूसखोरी जड़ता और यथार्थ का उद्धाटन किया है। यह कहानी सतही तौर पर एक व्यक्ति की व्यथा कथा दिखाई देती है, जो भ्रष्टाचार की चक्की में पिस रहा है, परन्तु इस कथा के पीछे लेखक की मानवीय करुणा और सामाजिक यथार्थ के प्रति आक्रोश झलकता है।
यह रचना स्वातन्त्र्योत्तर भारत के सामाजिक यथार्थ की सशक्त प्रस्तुति है। एक मामूली सरकारी कर्मचारी रिटायर हो गया और पाँच साल तक पेंशन के लिए चक्कर लगाते-लगाते मर गया। उसके जीव को लेने जब यमदूत गया तो जीव यमदूत को चकमा देकर ऐसा गायब हुआ कि बहुत खोजने पर भी नहीं मिला। आखिरकार जब नारद जी उसे ढूँढ़ते हुए स्वयं धरती पर आए तो वह जीव अपनी पेंशन फाइल में अटका हुआ पाया गया। आश्चर्य यह था कि नारद जी के कहने पर भी वह स्वर्ग में जाने को तैयार नहीं, क्योंकि उसका मन अपनी पेंशन फाइलों में ही अटक गया है। कहानी के माध्यम से परसाईं जी यह बताना चाहते हैं कि जिस भ्रष्टाचार से आज हम दबे हुए हैं वह इतना सर्वव्यापी है कि आज उसकी पहुँच अलौकिक हो गई। इस कहानी के प्रारम्भ में ही लेखक स्वर्ग और नरक की दिव्यता अलौकिकता का मिथक तोड़ देते हैं।
मिथक तोड़ते हुए वे कहते हैं कि कुछ भी जीवन के बाहर नहीं है और जीवन से अधिक सत्य कुछ भी नहीं है। जिस अलौकिकता को आधार बनाकर धर्म के पुरोहित-पण्डे लोगों को ठगते हैं उस अलौकिकता को.. प्रारम्भ में ये वाक्य धराशायी कर देते हैं। यह मनुष्य की जय का गान है, क्योंकि परसाईं जी की विचारधारा मानती है कि मनुष्य से बड़ा कुछ ' भी नहीं हैं। इस कहानी की शैली और भाषा अत्यधिक सरल व स्पष्ट है। इस कहानी का उद्देश्य भ्रष्टाचार की कथा कहना। भ्रष्टाचार कितना सनातन है, यह परसाईं जी ने इस कहानी के माध्यम से स्पष्ट रूप से दिखाया है।