निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश का ध्यानपूर्वक अध्ययन कर प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
संसार में दो अचूक शक्तियाँ हैं- वाणी और कर्म। कुछ लोग वचन से संसार को रह दिखाते हैं और कुछ लोग कर्म से। शब्द और आचार दोनों ही महान शक्तियाँ हैं। शब्द की महिमा अपार है। विश्व में साहित्य, कला, विज्ञान, शास्त्र सब शब्द-शक्ति के प्रतीक प्रमाण हैं। पर कोरे शब्द व्यर्थ होते है, जिनका आचरण न हो। कर्म के बिना वचन, व्यवहार के बिना सिद्धांत की कोई सार्थकता नहीं है।
निस्सन्देह शब्द शक्ति महान है, पर चिरस्थायी और सनातनी शक्ति तो व्यवहार है। महात्मा गाँधी ने इन दोनों की कठिन और अद्भुत साधना की थी। महात्मा जी का सम्पूर्ण जीवन उन्ही दोनों से युक्त था। वे वाणी और व्यवहार में एक थे। जो कहते थे वही करते थे। यही उनकी महानता का रहस्य है। कस्तूरबा ने शब्द की अपेक्षा कृति की उपासना की थी, क्योंकि कृति का उत्तम व चिरस्थायी प्रभाव होता है। 'बा' न कोरी शाब्दिक, शास्त्रीय, सैद्धांतिक शब्दावली नहीं सीखी थी। वे तो कर्म की उपासिका थीं। उनका विश्वास शब्दों की अपेक्षा कर्मों में था। वे जो कहा करती थीं उसे पूरा करती थी। वे रचनात्मक कर्मों को प्रधानता देती थीं। इसी के बल पर उन्होनें अपने जीवन में सार्थकता और सफलता प्राप्त की थी।