Comprehension Passage
जिस समय देश का शहरी समाज बढ़ने वाले आर्थिक संकटों के बावजूद नई चेतना की शक्ति लेकर आगे बढ़ रहा था, उसी समय देश का ग्रामीण अपनी निरक्षरता और कूप-मंडूकता के कारण इस नए प्रकाश से वंचित रहकर आर्थिक संकट के कारण क्रमश: टूटता चला जा रहा है। अंग्रेजों के आने से पहले तक हमारे गांवों ने चाहे और कितने ही संकट झेले हों पर विषय आर्थिक संकट से कभी उसका सामना नहीं पड़ा था। यह बात नहीं कि अंग्रेजों से पहले के भारतीय गांवों में गरीब नहीं होते थे पर गरीबी के कारण किसी को अपने बाल बच्चों के साथ कभी भूखों नहीं मरना पड़ा। परंतु बालक वाजपेयी के जमाने में बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक क्रांतियों के बावजूद अंगद के चरण की तरह डटे रहने वाले भारतीय लड़खड़ा चुके थे। नया जमाना गांवों में भी अपनी चाल चल रहा था। सम्पन्न किसान, पटवारियों के बेटे शहरों में पढ़-लिखकर बाबू बनने के लिए आने लगे थे। आर्थिक नाग-पाश से मुक्त होने के लिए बहुत से लोग बंबई, कलकत्ता, अहमदाबाद, मद्रास आदि की मिलों में जाकर मजदूर हो गए। बहुत से लोग दूसरे आस-पास के शहरों में जाकर पल्टल के सिपाही, दफ्तरों के चपरासी, पुलिसमैन, गुमाश्ते, टहलुए, रसोइए, पानी-पांडे, चौकीदार या छोटे-मोटे फेरी वाले सौदागर बन गए। रोटी की कश्मकश ने हमारे कलाकार वाजपेयी को क्या-क्या नहीं बनाया?

अंगद के चरण’ का कौन-सा आशय सही नहीं है?

1
अडिग
2
अविचल
3
ध्रुव
4
अस्थिर

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