गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें।
यदि साहित्य समाज का दर्पण होता तो समाज को बदलने की बात न उठती। कवि का काम यथार्थ जीवन को प्रतिबिंबित करना ही होता तो वह प्रजापति का दर्जा न पाता। वास्तव में प्रजापति ने जो समाज बनाया है, उससे असन्तुष्ट होकर नया समाज बनाना कविता का जन्मसिद्ध अधिकार है। यूनानी विद्वानों के बारे में कहा जाता है कि वे कला को जीवन की नकल समझते थे और अफलातून ने असार संसार को असल की नकल बताकर कला को नकल की नकल कहा था। लेकिन अरस्तू ने ट्रेजडी के लिए जब कहा था कि उसमें मनुष्य जैसे हैं उससे बढ़कर दिखाए जाते हैं, तो नकल-नवीस कला का खंडन हो गया था और जब बाल्मीकि ने अपने चरित्र नायक के गुण गिनाकर नारद से पूछा कि ऐसा कौन है? तब नारद ने पहले यही कहा - "बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः।" दुर्लभ गुणों को एक ही पात्र में दिखाकर आदि कवि ने समाज को दर्पण में प्रतिबिंबित न किया था वरन प्रजापति की तरह नई सृष्टि की थी।