"दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते हुए मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य, किन्तु फिर भी बोझल और प्रकम्पमय और घना-सा फैल रहा था..."

यह किस कहानी की प्रारंभिक पंक्तियाँ है?

1
रोज 
2
एक टोकरी भर मिट्टी 
3
अपना-अपना भाग्य 
4
कोसी का घटवार 

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