"काम - मंगल से मंडित श्रेय, सर्ग इच्छा का है परिणाम, 

तिरस्कृत कर उसको तुम भूल बनाते हो असफल भव धाम।

उपर्युक्त छंद से स्पष्ट है कि प्रसाद ने -

1
निवृत्ति मार्ग का प्रतिपादन किया है।
2
प्रवृत्ति मार्ग का प्रतिपादन किया है।
3
निराशा और कुंठा को महत्त्व दिया है।
4
काम को गर्हित बताया है।

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