'हाय ! रुक गया यहीं संसार 

बना सिंदूर अँगार !

वात हत लतिका वह सुकुमार 

पड़ी है छिन्नाधार !!' 

इस काव्यांश का प्रतिपाद्य है - 

1
स्त्री स्वावलंबी है I
2
पुरुष के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं है I
3
स्त्री के बिना पुरुष अधूरा है I
4
स्त्री - पुरुष स्वच्छंद है I  

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