Comprehension Passage
भारतीय काव्य-मनीषियों ने काव्य की वस्तु के साथ ही उसके अर्थ की सीमा का अन्वेषण भी किया है। काव्य की अर्थव्याप्ति समूचे मानवलोक में होती है। काव्य का संबंध उस अर्थ से है जिसमें कल्पना और सौंदर्य का आधार होता है। राजशेखर ने कल्पना को स्वीकार करते हुए कहा है कि काव्य के कर्ताओं को वस्तुओं का स्वरूप जैसा प्रतिभासित होता है उसका वर्णन वे उसी रूप में करते हैं। काव्य और दर्शन तथा काव्य और विज्ञान में भी अंतर होता है। काव्य का सत्य विज्ञान के सत्य से भिन्न है क्योंकि काव्य का सत्य तथ्यात्मक नहीं अनुभूत्यात्मक होता है और यह अनिवार्य रूप से मानवकल्याण का साधन भी है। काव्य में असत्य नामक वस्तु की कोई सत्ता संभव नहीं है बल्कि उसमें वर्णित वस्तुओं की अपनी एक विशिष्ट सत्ता होती है। काव्य की वस्तु कवि की निजी अनुभूति पर आधारित है। वस्तुतः काव्य में सत्याभास के समान प्रतीत अर्थवाद ही होता है जिसके आधार पर काव्य की वस्तु को असत्य नहीं कहा जा सकता। राजशेखर के अनुसार काव्य में शिव के साथ अशिव के समावेश का कारण यह है कि कवि लोक की यात्रा करता है और सुंदर के साथ असुंदर का चित्रण सुंदर की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए ही करता है। काव्य में सुंदर के साथ असुंदर, शिव के साथ अशिव और सत्य के साथ असत्य का समावेश रहता है। अतएव असुंदर या अशिव का चित्रण सुंदर और शिव के संप्रेषण के लिए अनिवार्य है। यह उपदेश निषेध रूप में ही होता है, विधेय रूप में नहीं, क्योंकि काव्य का मूल प्रयोजन सुंदर और शिव में अंतर्भूत है जो सत्य के रूप में ही व्यक्त होता है। आधुनिक काव्य में सौंदर्ययोध के नए व्यापक धरातल में सुंदर और असुंदर का समावेश किया गया है। प्राचीन काव्यशाम् में अर्थभिन्नता की दृष्टि से इसकी स्वीकृति इस तथ्य का प्रमाण है कि बदले हुए समसामयिक संदर्भ में भी इस काव्यद्ष्टि की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। वस्तुतः काव्यमनीषियों की दृष्टि एकांगी न होकर समन्वयात्मक रही है जो उसकी प्रगतिशील दृष्टि का ही प्रतीक है। यह सत्य है कि इस दृष्टि का कारण मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद न होकर आदर्शवादी दार्शनिकता ही है।
उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार काव्य-मनीषियों की प्रगतिशील दृष्टि का आधार क्या है?
1
काव्य को तथ्यात्मक रूप में चित्रित करना
2
समन्वयात्मक दृष्टि को अपनाना
3
काव्य में अशिव और असुदर को प्रमुखता देना
4
कल्पना को काव्य का आधार बनाना