निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
साहित्य का संबंध व्यक्ति और राष्ट्रीय जीवन से है। जगत की परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना वह रह ही नहीं सकता, इसीलिए कि वह स्वयं जगत का ही एक अंग है। जीवन में जो क्रियाएँ हो रही हैं साहित्यकार में उनकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक और अनिवार्य है। समाज का प्रभाव साहित्यकार पर न पड़े, यह असंभव है। हाँ, साहित्यकार पलायन अवश्य कर सकता है, आँख बंद कर सकता है जैसा कि दरबारी कवियों ने किया। आज की परिस्थितियाँ बिल्कुल भिन्न हैं। पात्रों और परिस्थिति का ख्याल रखना जरुरी है, क्योंकि इनका ख्याल रखे बिना रस का उद्रेक नहीं हो सकता। कोरा शब्दाडम्बर टिकाऊ नहीं। साहित्यकार तो सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक सहृदय, संवेदनशील प्राणी होता है कि अपने देश और काल की ठीक-ठीक परिस्थितियों का निर्भीक चित्रण करे। यदि देश दुखी है और भूख, गुलामी और शोषण का शिकार है और साहित्यकार इन सब क्लेशों की उपेक्षा करके मौज का राग अलापता है तो वह राष्ट्रीय जीवन से कोसों दूर है, वह राष्ट्र के प्रति, साहित्य के प्रति विश्वासघात करता है। उसे साहित्यकार कहलाने का अधिकार नहीं है। साहित्यकार फोटोग्राफर मात्र नहीं है। यह उचित है कि साहित्यकार समाज का दोष जाने, परन्तु केवल उसी के यथार्थ - चित्रण से साहित्यकार का कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता। पर साहित्यकार प्रचारक नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी रचना की सामाजिक उपादेयता नहीं होती। हमारे प्राचीन, संस्कृत के साहित्याचार्यों ने साहित्य को उपादेयता की आधार-भूमि पर प्रतिष्ठित किया है। अशिव की क्षति साहित्य का बड़ा पुनीत अनुष्ठान है। कोई साहित्यकार राष्ट्र के लिए उपयोगी साहित्य का सृजन कर रहा है, इस बात की अकेली पहचान यह है कि साहित्यकार सत्य तथा राष्ट्रीयता को अपनी श्रद्धानुसार जिस रूप में ग्रहण करे, उसी रूप में निर्भयतापूर्ण व्यक्त करे, भागे नहीं।