निर्देशः निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और प्रश्न का उत्तर दिए गए विकल्पों में से चुनिए:
सूफी साधक ईश्वर को निराकार भी मानते हैं और साकार भी। वे ईश्वर को मनुष्य की आत्मा और मानव-जीवन को उस आत्मा का आवरण मानते हैं। प्रायः, प्रत्येक साधक ईश्वर की कल्पना परम सुन्दरी नारी के रूप में करता है जिस पर वह आसक्त होना चाहता है। सूफी-मत में परमेश्वर साकार सौन्दर्य है और साधक साकार प्रेम।
सूफी-सम्प्रदाय में साधिकाएँ भी हुई हैं, जो परमात्मा को अपना पति समझती थीं। इनमें से, बसरे की राबिया नाम की साधिका बहुत प्रसिद्ध हुईं। कहते हैं, एक बार उन्होंने कहा था कि “मेरा हृदय परमात्मा के प्रेम से ऐसा लबालब भर गया है कि उसमें नबी के भी प्रेम के लिए जगह नहीं रही, फिर शैतान के प्रति घृणा की तो बात ही क्या है। "
सौन्दर्य से प्रेम और प्रेम से मुक्ति, यह सूफी-मत के सिद्धान्तों का निचोड़ है। इसी प्रेम की सिद्धि के लिए सूफियों ने इश्के-मजाजी की भी छूट दी, क्योंकि इश्के-मजाजी से भी इश्के-हकीकी हासिल हो सकता है। वैसे, सूफी-मत यति-वृत्ति, वैराग्य-साधना, योग और संयम, सब पर जोर देता है।
सौन्दर्य और प्रेम के बाद सूफियों में संगीत की प्रधानता है, क्योंकि संगीत में मन को केन्द्रित करके उसे ऊपर ले जाने की शक्ति होती है। उसका उपयोग सूफी सन्त समाधि की सुगमता के लिए किया करते हैं।
मनुष्य के सीमित गुणों को सूफी 'नासूत' कहते हैं और भगवान् की निस्सीमता को 'लाहूत'। इसी प्रकार, जब तक मनुष्य मोक्ष अथवा ईश्वर-मिलन से दूर है, तब तक उसकी स्थिति 'बका' की स्थिति समझी जाती है तथा जब वह मोक्ष अथवा ब्रह्म मिलन को प्राप्त करता है, तब वह 'फना' (विनाश, निःशेषता या निर्वाण) की स्थिति में पहुँच जाता है। सूफियों के दो सम्प्रदाय हैं जिनमें से एक तो यह मानता है कि सृष्टि का उपादान-कारण प्रकाश है और दूसरा यह है कि सृष्टि विचार से निकली हैं। सूफियों में एक सम्प्रदाय और है, जो हुलूल (अवतारवाद), इम्तिज़ाज (अंशावतारवाद) और नस्खे-अरबा यानी आत्मा के आवागमन में विश्वास करता है।