निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
जब अंग्रेज आए, भारत का बहुत ही बुरा हाल था। भारतवासी अपने इतिहास को भूल चुके थे; वे बाहर का तो क्या, अपने देश का भी भूगोल ठीक से नहीं जानते थे। वैयक्तिता का विष जो भारत में बहुत दिनों से चला आ रहा था, इस काल में आकर और भी बढ़ गया था। समाज और देश के प्रति भी हमारा कोई कर्तव्य है, इस बात को लोग बिल्कुल ही भूल बैठे थे। इस अवस्था के बीच पहले-पहल अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा ही वह दल आविर्भूत हुआ, जिसका उद्देश्य सामाजिक था, जो केवल अपने को ही नहीं, अपने देश और समाज को भी पहचानने की इच्छा रखता था। समाज और देश के प्रति जो नवीन चेतना जगी, उसी के भीतर से हमारी राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों का जन्म हुआ है। सामाजिक चेतना ही वह गुण है जो आज के औसत भारतवासी को प्राचीन अथवा मध्ययुगीन भारतवासी से विभक्त करता है और यह चेतना भारत को यूरोपीय संपर्क से मिली है। यह ठीक है कि भारतीय जनता को अशिक्षा एवं अंधविश्वास की जकड़बंदी से छुड़ाने अथवा उसके भीतर प्रगतिशील विचारों को प्रेरित करने का काम अंग्रेज शासकों ने नहीं किया, किन्तु, नई विद्या के प्रचार से ये सारे कार्य आप से आप हो गए। नई शिक्षा का एक अन्य श्रेष्ठतम परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी के भीतर से यूरोप के तेजपूर्ण विचारों का सेवन करते - करते शिक्षित भारतवर्ष की मानसिक एकता में वृद्धि हुई। संस्कृत के सार्वदेशिक भाषा होने के कारण, पहले भी सारा भारत एक था, किन्तु संस्कृत का भारत में जितना अन्तःप्रांतीय प्रचार था, उससे कुछ अधिक प्रचार अब अंग्रेजी का हो गया।
सबसे बड़ी बात यह हुई कि जब अंग्रेजी भाषा भारत में अपना पाँव फैला रही थी. ठीक उसी समय, यूरोप में स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, प्रजातंत्र और उदार भावनाओं के जोरदार आन्दोलन चल रहे थे। अठारहवीं सदी के यूरोप के क्रांतिकारी विचारों के जो नेता उत्पन्न हुए, अनेक हलचलों और क्रांतियों के बाद उन्नीसवीं सदी में आकर उनके विचारों ने दर्शन का रूप ले लिया और वे यूरोप को आंदोलित करने लगे। विचारों का यह आन्दोलन सहस्त्र धाराओं में चल रहा था एवं कविता, नाटक, उपन्यास, आलोचना, निबंध, दर्शन, भाषण और शास्त्रार्थ तथा राजनैतिक दलों एवं सरकारों के संगठनों में से, सब - के - सब, इन विचारों से, ओत - प्रोत हो रहे थे। फ्रांसीसी क्रांति का ‘स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व वाला महान उद्घोष अब पिघलकर उदारतावाद में ढल गया था। खुद इंग्लैण्ड में उस समय क़ानूनी सुधारों को लेकर घमासान आन्दोलन चल रहा था। राज्य वही अच्छा है जिसमें अधिक - से - अधिक लोगों का अधिक - से - अधिक कल्याण हो, ये और ऐसे अनेक अन्य विचार इंग्लैण्ड में भी गृहीत होते जा रहे थे।