निर्देश: निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए:
बिम्बविधान बहुत से विश्रृंखल क्षणों का एक समुच्चय होता है। उसका आधार जीवन और जगत् की 'अनेकता' में है। इस के विपरीत प्रतीक किसी सूक्ष्म और गहरी 'एकता' का बोधक होता है। इसी लिए प्रतीकों की योजना मे जाने-अनजाने एक तार्किक संगति अवश्य रहती है। परन्तु बिम्बविधान में तार्किक संगति का पाया जाना लगभग असम्भव है, और यदि पायी भी जाती है तो वह उसकी तीव्रता को कम करती है, बढ़ाती नहीं। प्रतीक का स्रोत कवि के व्यक्तिगत अनुषंगों में हो सकता है, परन्तु उसका आकलन आनुषंगिक नियमों के आधार पर नहीं होता। उस के निर्माण में, अज्ञात रूप से ही सही, एक प्रकार की अन्तर्दृष्टि या सूक्ष्म बौद्धिक प्रेरणा अवश्य रहती है, परन्तु बिम्ब का सम्पूर्ण ढाँचा आनुषंगिक नियमों के द्वारा बुना जाता है। इसलिए उस के संघटन में प्रायः अबौद्धिकता, अन्तर्विरोध और व्यतिक्रम पाया जाता है। प्रतीक मूर्त और अमूर्त दोनों ही हो सकता है।
इसके विपरित बिम्ब के लिए, ज्ञानेन्द्रिय के किसी भी स्तर पर मूर्त होना आवश्यक है। यह मूर्तता केवल दृष्टि-विषयक ही नहीं होती; नाद, घ्राण और स्वादपरक हो सकती है। प्रतीक किसी वस्तु का चित्रांकन नहीं करता, केवल संकेत द्वारा उस की किसी विशेषता को ध्वनित करता है। इसीलिए प्रतीक का ग्रहण सन्दर्भ से अलग और एकान्त रूप से भी सम्भव हो सकता है। पर बिम्ब की प्रेषणीयता उस के पूरे संन्दर्भ के साथ होती है।