तपै लागि अब जेठ असाढ़ी I मोहि पिउ बिन छाजनि भइ गाढ़ी II

तन तिनउर भा, झूरौं खरी I भइ बरखा, दुख आगरि जरी II

इस पूरे कड़वक में नागमती की विरह - दशा के बारे में यह विचार किसका है ?

"यह आशिक माशूकों का निर्लज्ज प्रलाप नहीं है; यह हिन्दू ग्राहिणी की विरहवाणी है I इसका सात्विक मर्यादापूर्ण माधुर्य मनोहर है I"

1
चन्द्रबली पांडेय
2
रामचंद्र शुक्ल 
3
माताप्रसाद गुप्त 
4
श्याम मनोहर पांडेय

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