"सतपुड़ा के घने जंगल / नींद में डूबे हुए से,

ऊँघते अनमने जंगल।

झाड़ ऊँचे और नीचे / चुप खड़े हैं आंख मीचे,

घास चुप है, काश चुप है। मूक शाल, पलाश चुप है;

बन सके तो धँसो इनमें, / धँस न पाती हवा जिनमें ....."

उपर्युक्त काव्य पंक्तियों का आशय है:

1
जंगल घना और भयावह है।
2
जंगल में जीवन का कोई निशान नहीं है।
3
यहाँ जंगल केवल जंगल नहीं, जीवन की चुनौती है।
4
यह जंगल केवल योगी-यतियों के लिए उपयुक्त है।

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