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हिन्दी प्रदेश में नवजागरण 1857 ई. के स्वाधीनता संग्राम से शुरू होता है। इस स्वाधीनता संग्राम की पहली विशेषता यह है कि यह सारे देश की एकता को ध्यान में रखकर चलाया गया था। राष्ट्रीय एकता का यह उद्देश्य भारतीय सेना के नेताओं ने अपने सामने रखा था, सामन्तों ने नहीं। इसीलिए जो नवाब स्वतन्त्र बादशाह बन बैठे थे, उन्हें भारतीय सेना के नेतृत्व ने दिल्ली के मातहत करार दिया और इसी शर्त पर उनके साथ संयुक्त मोर्चा बनाया। अपने विघटनकाल में भारतीय सामन्तवाद राष्ट्रीय एकता की पहचान खो चुका था। अलग-अलग बादशाहों, नवाबों और राजाओं की सत्ता कायम करने के बदले सभी सामन्तों को एक ही झंडे के नीचे संगठित करने का प्रयत्न एक सामन्त-विरोधी कार्य था।
इस संग्राम की दूसरी विशेषता यह है कि राज्यसत्ता की मूल समस्या सामन्तों के हित में नहीं, जनता के हित में हल की गई थी। बहादुरशाह को सारे देश का बादशाह घोषित किया गया था किन्तु वास्तविक सत्ता बादशाह या उसके अनुयाइयों के हाथ में नहीं थी । सैनिक नेतृत्व ने दिल्ली के बादशाह को वही दर्जा दिया था जो ब्रिटेन में वहाँ के बादशाह को हासिल था। वह राज्यतंत्र में मुखिया बनाया गया था पर आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक अधिकार उस 'कोर्ट' के हाथ में थे जिसमें भारतीय सेना के चुने हुए प्रतिनिधि थे।
इस संग्राम की तीसरी विशेषता यह है कि अंग्रेज़ों ने जमींदारों और साहूकारों को जहाँ भी नये अधिकार दिये थे, जहाँ भी किसानों के विरुद्ध इन शोषकों के पक्ष में उन्होंने फ़ैसले किए थे, वहाँ भारतीय सेना का प्रभुत्व कायम होते ही, अथवा अंग्रेज़ों का प्रभुत्व खत्म होते ही, जनता ने अंग्रेज़ों की कायम की हुई व्यवस्था उलट दी। इस तरह की कार्रवाई से इस स्वाधीनता - संग्राम का सामन्तविरोधी पक्ष और पुष्ट होता था।
इस संग्राम की चौथी विशेषता यह है कि इसका नेतृत्व उन किसानों ने किया जो फौज में सिपाहियों और सूबेदारों के रूप में काम कर रहे थे। अनेक छोटे-बड़े सामन्त इनके सहायक थे, संग्राम के नेता नहीं। अक्सर वे देशी सेना के दबाव में आकर अंग्रेज़ों से लड़े। फौज के भीतर वाले किसानों के साथ गाँवों के गैर-फ़ौजी किसान थे, और इन दोनों ने मिलकर जो हथियारबंद लड़ाई चलाई, वैसी लड़ाई न तो सन् 57 से पहले कभी चलाई गई थी, और न उसके बाद कभी चलाई गई। लड़नेवाले किसानों में केवल उच्च वर्ण हिन्दू नहीं थे। उनके साथ निम्न वर्ण के सैकड़ों आदमी थे। हिन्दुओं के साथ हज़ारों मुसलमान थे। धर्म और वर्ण की सीमाएँ तोड़कर लाखों किसान एक ही लड़ाई में शामिल हुए।