निर्देश : निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दिए गए विकल्पों में से चुनिए।
“काव्य का आभ्यंतर स्वरूप या आत्मा भाव या रस है। अलंकार उसके बाह्य स्वरूप हैं। दोनो में कल्पना का काम पड़ता है। जिस प्रकार विभाव, अनुभाव में हम उसका प्रयोग पाते हैं उसी प्रकार रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों में भी। जबकि रस ही काव्य में प्रधान वस्तु है तब उसके संयोजकों में जो कल्पना का प्रयोग होता है वही आवश्यक और प्रधान ठहरा। रस का आधार खड़ा करने वाला जो विभावन व्यापार है कल्पना का प्रधान कार्य क्षेत्र वही हैं। पर वहांँ उसे अनुभूति व एगात्मिका वृत्ति के आदेश पर कार्य करना पड़ता है। उसे ऐसे स्वरूप खड़े करने पड़ते हैं जिनके द्वारा रति, दास, शोक, क्रोध, घृणा आदि स्वयं अनुभव करने के कारण कवि जानता है कि श्रोता भी अनुभव करेंगे। अपनी अनुभूति की व्यापकता के कारण मनुष्य मात्र की अनुभूति को तथा उसके विषयों को अपने हृदय में रखने वाला ही ऐसे स्वरुपों को अपने मन में ला सकते हैं।”