"पहिले घन आनंद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार-पगी।
अब लाय-वियोग की लाय बलाय बढ़ाय, बिसासि दगानि दगी।
अँखियाँ दुखियानि कुबानि परी न कहुँ लगें, कौन घरी सु लगी।
मति दौरि थकी, न लहै ठिक ठौर, अमोही के मोह - मिठास ठगी।।"
उक्त सवैया में प्रयुक्त 'लाय' में कौन सा अलंकार है?
1
यमक
2
श्लेष
3
वीप्सा
4
अपहनुति