ऋतु वसंत का सुप्रभात था, मंद-मंद था अनिल बह रहा,

बालारुण की मृदु किरणें थीं, अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे,

एक-दूसरे से विरहित हो अलग-अलग रह कर ही जिनको

सारी रात बितानी होती, निशाकाल के चिर-अभिशापित

बेबस उन चकवा-चकई का बंद हुआ क्रंदन .....

उपर्युक्त पंक्तियों में चकवा चकई के बारे में व्यक्त नागार्जुन के विचार को साहित्य जगत में कहा जाता है-

1
जीवनानुभव
2
समाज-बोध
3
कवि प्रसिद्धि
4
अपवाद

Sponsored

hivanix.in

Visit

This quiz is brought to you by hivanix.in

🌐 Web App Development

Quick Navigation