Comprehension Passage

निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

हिंदी आज भी स्वयं अपने क्षेत्रों में विचार और चिंतन की भाषा नहीं बन सकी है। यह नहीं कि उसके ऐसा बनने में कोई आत्यंतिक असामर्थ्य है। सामर्थ्य का कोई अभाव नहीं है पर फिर भी तथ्य यह है कि उसमें दर्शन, विज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान आदि का कोई मौलिक या तात्विक कार्य नहीं हुआ है। हम ऐसे किसी बड़े दार्शनिक, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक का नाम नहीं ले सकते जिसका बुनियादी कार्य सीधे हिंदी में हुआ और मान्य हुआ हो। दूसरे शब्दों में यह कि हिंदी भाषा जैसी वह आज है न साहित्यप्रेमी है, न विचारप्रेमी । इसे शायद इस तथ्य से भी प्रमाणित माना जा सकता है कि फूहड़ और सतही का आकर्षण हिन्दी क्षेत्रों में कई गुना बढ़ा और फला-फूला है।

अपनी भाषा के प्रति जैसा लगाव या ममत्व कई हिंदीतर अंचलों में है उसकी तो जैसे कल्पना भी हमारे यहां करना असम्भव है। मराठी में लेखकों की एक प्रदेशव्यापी यात्रा ग्रन्थावली निकलती है और लाखों रूपयों की पुस्तकें सीधे पाठकों को बेचकर सम्पन्न होती है। हिन्दी समाज में सूक्ष्मता और जटिलता के प्रति एक तरह की हिंस्र और आक्रामक असहनशीलता बढ़ी है। उसका प्रभाव आलोचना पर भी पड़ा है। यहां विस्तार में जाना जरूरी नहीं है कि कैसे एक जटिलता-विरोधी नया शास्त्र विकसित किए जाने की गम्भीर चेष्टा हो रही है और कैसे हमारी कृतियों और लेखकों को सहजता - सरलता की नयी सारिणियों में रखा जा रहा है और कैसे इस चेष्टा का अर्थ अंततः हिंदी की अपनी जातीय परम्परा का अवमूल्यन है।

हिंदी भाषी अंचल में राज बढ़ता जाता है, समाज घटता जाता है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जो सदियों से राज के हस्तक्षेप से बाहर माने जाते थे। वे सब धीरे-धीरे राज के दायरे में आ गए : राज ने उन्हें समाज से लगभग छीन लिया है और हमने ऐसा होने को अपना मूक- मुखर समर्थन दिया है। सामाजिक कर्म और सार्वजनिक जीवन के इतने सारे क्षेत्र हैं जिनमें हिंदी अंचलों में कोई स्वतः स्फूर्त आंदोलन या सामाजिक सक्रियता नहीं है जबकि उदाहरण के लिए महाराष्ट्र गुजरात या केरल में शिक्षा, पर्यावरण, संस्कृति आदि क्षेत्रों में समाज की उपस्थिति और क्रियाशीलता प्रमुख है न कि राज की हिंदी में तो साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन पाठकों पर नहीं सरकारी खरीद पर भयावह रूप से निर्भर है : कई बार तो यह दुःस्वप्न सताता है कि जल्दी ही हम हिंदी के समाज में नहीं, हिंदी के राज में रहने लगेंगे।

उपर्युक्त अनुच्छेद में हिन्दी और हिन्दी समाज के बारे में कौन सा कथन नहीं कहा गया है ?  

1
हिन्दी भाषा आज न साहित्य प्रेमी है न विचार प्रेमी ।
2
हिन्दी क्षेत्रों में फूहड़ और सतही के प्रति विकर्षण बढ़ा है।
3
हिन्दी समाज में सूक्ष्मता और जटिलता के प्रति आक्रामक असहनशीलता बढ़ी है।
4
हिन्दी भाषी अंचल में राज बढ़ता जाता है, समाज घटता जाता है।

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