"यह वह देश है, जहाँ की प्रजा एक रामचंद्र के राजतिलक पाने के आनंद में मस्त थी और अगले दिन अचानक रामचंद्र बन को चले तो रोती-रोती उनके पीछे जाती थी। भरत को उस प्रजा का मन प्रसन्न करने के लिये कोई भारी दरबार नहीं करना पड़ा, हाथियों का जुलूस नहीं निकालना पड़ा, बरंच दौड़कर बनमें जाना पड़ा और रामचंद्र को फिर अयोध्या में लाने का यत्न करना पड़ा।"
उपर्युक्त पंक्तियाँ 'शिवशंभू के चिट्ठे' निबन्ध के किस चिट्ठे से ली गई है?
1
श्रीमान का स्वागत
2
वैसराय का कर्तव्य
3
पीछे मत फेंकिए
4
आशा का अंत