"पिउ सौं कहेहु सँदेसड़ा, हे भौंरा ! हे काग !

सो धनि बिरहै जर मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग ।।"

- में भौंरे व काग को अलग-अलग सम्बोधित करने की व्याख्या के प्रसंग में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है

1
यह अलंकार का प्रभाव है।
2
रंग की समानता से यही सम्भव है।
3
आवेग की दशा में यही उचित है।
4
छन्द की पाद पूर्ति हेतु किया गया है।

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