"जेहि पंखी के निअर होइ कहै विरह कै बात ।

सोई पंखी जाइ जरि तरिवर होइ निपात ।।"

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन पंक्तियों में माना है।

1
प्रकृति का सुरम्य चित्रण
2
ऊहात्मक पद्धति
3
विरह ताप की विशद व्यंजना
4
अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण

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