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गत कुछ वर्षों में जिस तरह मोबाइल फ़ोन उपभोक्ताओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, उसी अनुपात में सेवा प्रदाता कंपनियों ने जगह-जगह टावर खड़े कर दिए हैं। इसमें यह भी ध्यान नहीं रखा गया कि जिन रिहाइशी इलाकों में 1 लगाए जा रहे हैं, वहाँ रहने वाले और दूसरे जीवों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा। मोबाइल टावरों से होने वाले विकिरण से मनुष्य और पशु-पक्षियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर के मद्देनज़र विभिन्न अदालतों में 2 दायर की गई हैं। शायद यही वजह है कि सरकार को इस दिशा में 3 करनी पड़ी। केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार टावर लगाने वाली कंपनियों को अपने मौजूदा रेडियो फ्रिक्वेंसी क्षेत्र में दस फीसदी की कटौती करनी होगी। मोबाइल टावरों के विकरण से होने वाली 4 जैसी गंभीर बीमारियों का मुद्दा देशभर में लोगों की चिंता का कारण बना हुआ है। पिछले कुछ महीनों में आम नागरिकों और आवासीय कल्याण संगठनों ने न सिर्फ रिहाइशी इलाकों में नए टावर लगाने का 5 किया, बल्कि मौजूदा टावरों पर भी सवाल उठाए हैं। अब तक कई अध्ययनों में ऐसी आशंकाएँ व्यक्त की जा चुकी हैं कि मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडियो तरंगें न केवल पशु-पक्षियों, बल्कि मनुष्य के 6 के लिए भी कई रूपों में हानिकारक सिद्ध हो सकती हैं।पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ओर से कराए एक अध्ययन की रिपोर्ट में तथ्य सामने आए कि गौरयों और मधुमक्खियों की तेज़ी से घटती संख्या के लिए बड़े पैमाने पर लगाए जा रहे मोबाइल टावरों से निकलने वाली विद्युत्-चुंबकीय तरंगें कारण हैं। इन पर हुए 7 में पाया गया है कि मोबाइल टावर के पाँच सौ मीटर की सीमा में रहने वाले लोग अनिद्रा, सिरदर्द, थकान, शारीरिक कमजोरी और त्वचा रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं, जबकि कुछ लोगों में चिड़चिड़ापन और घबराहट बढ़ जाती है। फिर मोबाइल टावरों की रेडियो फ्रिक्वेंसी तरंगों को मनुष्य के लिए पूरी तरह 8 मान लेने का क्या आधार हो सकता है? टावर लगाते समय 9 कंपनियाँ तमाम नियम-कायदों को ताक पर रखने से नहीं हिचकतीं। इसलिए चुंबकीय तरंगों में 10 लाने के साथ-साथ, टावर लगाते समय नियमों की अनदेखी पर नकेल कसने की आवश्यकता है।